सख्त परिश्रम का कोई विकल्प नहीं.... इँदिरा गांधी
कहानी है नरेंद्र रावलकी...नरेंद्र रावल का जन्म गुजरात की हलवद तहसील के माथक गांव में हुआ था। पहली बार 12 साल की उम्र में दिवाली पर पटाखे की दुकान लगाकर 6 हजार रुपए कमाए थे और यहीं से उन्हें बिजनेस का चस्का लगा।
नरेंद्र रावल महीने 70रुपिया में नौकरी करता था और कभी मंदिर में काम किया करते थे और मंदिर के बाहर ही सोया करते थे,औऱ जो पगार मिलता था वो गाँव मावतर को भेज देता और दान-बशीस से गुजारा करता था.परमात्माने रावल की ह्दय की प्रार्थना सुन ली.भुज में स्वामीनारायण मंदिर में पुजारी रहते हुए संस्कृत और ज्योतिष विद्या का अभ्यास किया.और रसोई में भी प्रवीणता प्राप्त की.
उसकी सेवा और सत्य प्रियता से ख़ुश होकर नैरोबी(केन्या में) के स्वामीनारायण मंदिर में पुजारी न होने के चलते रावल को पुजारी बनने का ऑफर मिला। उन्हें इस काम के बदले हर महीने 400 सिलिंग सैलरी मिलती थी। वो तीन साल तक वहां पुजारी रहे और इसके बाद फैमिली की जिद के चलते शादी कर ली। इसके बाद उन्हें मंदिर छोड़ना पड़ा।
शादी के बाद उन्हें नैरोबी की एक हार्डवेर की दुकान में काम मिला, जहां रोजाना 18 घंटे काम करना पड़ता था।
इसी काम के दौरान उनकी मुलाकात स्टील के बिजनेसमैन डाह्याभाई पटेल से हुई। डाह्याभाई ने उन्हें 4 लाख रुपए की मदद देकर हार्डवेर की एक दुकान खुलवा दी।
1992 में 70 हजार डॉलर का लोन मिल गया। रावलभाई ने इन पैसों से एक छोटी सी स्टील कंपनी खोली।
उन्होंने केन्या में कई स्टील कंपिनयों की नींव रखी और आज वो केन्या में कई स्टील मिल के मालिक हैं। रावलभाई की यूथोपिया, युगांडा और कांगो में कई स्टील फैक्ट्रियां हैं।
केन्या में उन्होंने गरीब बच्चों के लिए फ्री एजुकेशन, पानी की सुविधा, एड्स पीड़ितों की मदद सहित अनेक सोशल वर्क किए हैं।केन्या के सर्वोच्च अवॉर्ड Elder of Burning Spear से भी सम्मानित किया जा चुका है। 2007 में उन्हें केन्या के प्रेसिडेंट अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया। वहीं, 2012 में उन्हें यूके के फिलेनथ्रॉपी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
टिप्पणी:-यह कहानी कोई अधूरापन दिखे तो मेरी गलती समजना... यह सुनी हुई सत्य कहानी में दोहरा रहा हुं...🙏🌹जय प्रभु.. सब पर कृपा करे🌹🙏
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