Monday, 26 October 2020

सौ शिक्षक बराबर एक माँ

  माँ के अनंत उपकार माँ ही शिक्षक, वैद्य भी, माँ है देवी अवतार 

जितना कहो कम पड़े, माँ की महिमा अपार।।

एक दिन थॉमस एल्वा एडिसन जो कि प्रायमरी स्कूल का विद्यार्थी था,अपने घर आया और एक कागज अपनी माताजीको दिया और बताया:-

" मेरे शिक्षक ने इसे दिया है और कहा है कि इसे
अपनी माताजी को ही देना..!"

उक्त कागज को देखकर माँ की आँखों में आँसू आ गये और वो जोर-जोर से रो पड़ी,जब एडीसन ने पूछा कि
"इसमें क्या लिखा है..?"

तो माँ ने आँसू पोंछ कर हसते हुए बोलीं:-इसमें लिखा है.."आपका बच्चा जीनियस है हमारा स्कूल छोटे
स्तर का है और शिक्षक बहुत प्रशिक्षित नहीं है, इस प्रतिभाशाली बच्चे को हम नही पढ़ा पा रहें,इसे आप स्वयं शिक्षा दें ।


थॉमस एल्वा एडिसन जग प्रसिद्ध वैज्ञानिक बन गये।उसने कई महान अविष्कार किय कई वर्षों के बाद उसकी माँ का स्वर्गवास हो

एक दिन वह अपने पारिवारिक वस्तुओं को देख रहे थे, तभी आलमारी के एक कोने में उसने कागज का एक टुकड़ा देखा.. उत्सुकतावश उसे खोलकर देखा और पढ़ने लगा।

वो वही काग़ज़ था..जो शिक्षक ने माँ को देने का कहा था।उस काग़ज़ में लिखा था-
"आपका बच्चा बौद्धिक तौर पर बहुत कमजोर है, पढ़ाई के लायक नहीं है...और उसे अब और इस स्कूल में नहीं आना है।"
एडिसन आवाक रह गये और घण्टों रोते रहे,
फिर अपनी डायरी में लिखा "एक महान माँ ने बौद्धिक तौर पर मंद बच्चे को महान वैज्ञानिक बना दिया"......
यही सकारात्मकता माँ की शक्ति



 

 

 

 

 

Saturday, 24 October 2020

आत्महत्या रोकने के सरल उपाय

 हमारे रोजमर्रा के जीवन में भी कई बार ऐसे पल आते है जब हम खुद को कमजोर महसूस करते है। तब हम सोचते है काश कोई हो जो हमें गले से लगाकर कह दे, तुम निराश या मायूस मत हो, होसला मत तोड़ सब कुछ सही होगा। देख मैं खड़ा हूँ ना तेरे साथ।


चंद्रयान 2 चंद्रमा की सतह से लगभग जब दो किलोमीटर की दूरी पर था उसका भारत की स्पेस एजेंसी इसरो से सम्पर्क टूट गया। करीब ग्यारह वर्ष के रात-दिन मेहनत करोड़ों रूपये की लागत और करोड़ों देशवासियों का सपना भी इसी के साथ मानो टूट गया। देश के हजारों वैज्ञानिक इस से कुछ पल को मायूस भी हो गये। मायूसी के इस माहौल में देश के प्रधानमंत्री का  इसरो चीफ को गले लगाकर उनकी पीठ थपथापाने वाला पल बेहद भावुक कर देना वाला था।

इस घटना को राजनीती के बजाय एक शिक्षा के रूपमें  देखा जा सकता है।


शिक्षा बोर्ड के दसवीं बारहवी के नतीजे आने के बाद हर वर्ष देश में शिक्षकों और अभिभावको की फटकार के कारण न जाने कितने किशोर छात्र-छात्राएं घबराकर, डरकर या अन्य किसी अवसाद के कारण आत्महत्या का रास्ता चुनते है।
केवल शिक्षा ही नहीं व्यापार और खेल जगत में भी कई होनहार युवा असफलता के भय और फटकार के कारण आत्महत्या जैसे रास्ते को चुन लेते है।
 

कोई माता-पिता या शिक्षक ऐसे होते है जो उन पलों में उसे ऐसे गले लगाकर कहते हो कि कोई बात नहीं बेटे तुमने अच्छी मेहनत की आगे और बेहतर करने की कोशिश करना तो आत्महत्या का प्रमाण शून्य हो सकता है.

अनेकों मौकों पर हम ही  अपनो का मनोबल तोड़ देते है। एक किस्म से कहे तो एक नासमझी के कारण कई बार बच्चों और युवाओं को शारीरिक और मानसिक यातना के दौर से गुजरना पड़ता है।


 

Friday, 23 October 2020

सख्त परिश्रम का कोई विकल्प नहीं

सख्त परिश्रम का कोई विकल्प नहीं.... इँदिरा गांधी


कहानी है नरेंद्र रावलकी...नरेंद्र रावल का जन्म गुजरात की हलवद तहसील के माथक गांव में हुआ था। पहली बार 12 साल की उम्र में दिवाली पर पटाखे की दुकान लगाकर 6 हजार रुपए कमाए थे और यहीं से उन्हें बिजनेस का चस्का लगा।

नरेंद्र रावल महीने 70रुपिया में नौकरी करता था और कभी मंदिर में काम किया करते थे और मंदिर के बाहर ही सोया करते थे,औऱ जो पगार मिलता था वो गाँव मावतर को भेज देता और दान-बशीस से गुजारा करता था.परमात्माने रावल की ह्दय की प्रार्थना सुन ली.भुज में स्वामीनारायण मंदिर में पुजारी रहते हुए संस्कृत और ज्योतिष विद्या का अभ्यास किया.और रसोई में भी प्रवीणता प्राप्त की.

उसकी सेवा और सत्य प्रियता से ख़ुश होकर नैरोबी(केन्या में)  के स्वामीनारायण मंदिर में पुजारी न होने के चलते रावल को पुजारी बनने का ऑफर मिला। उन्हें इस काम के बदले हर महीने 400 सिलिंग सैलरी मिलती थी। वो तीन साल तक वहां पुजारी रहे और इसके बाद फैमिली की जिद के चलते शादी कर ली। इसके बाद उन्हें मंदिर छोड़ना पड़ा।

शादी के बाद उन्हें नैरोबी की एक हार्डवेर की दुकान में काम मिला, जहां रोजाना 18 घंटे काम करना पड़ता था।

इसी काम के दौरान उनकी मुलाकात स्टील के बिजनेसमैन डाह्याभाई पटेल से हुई। डाह्याभाई ने उन्हें 4 लाख रुपए की मदद देकर हार्डवेर की एक दुकान खुलवा दी।

1992 में 70 हजार डॉलर का लोन मिल गया। रावलभाई ने इन पैसों से एक छोटी सी स्टील कंपनी खोली।

उन्होंने केन्या में कई स्टील कंपिनयों की नींव रखी और आज वो केन्या में कई स्टील मिल के मालिक हैं। रावलभाई की यूथोपिया, युगांडा और कांगो में कई स्टील फैक्ट्रियां हैं।

केन्या में उन्होंने गरीब बच्चों के लिए फ्री एजुकेशन, पानी की सुविधा, एड्स पीड़ितों की मदद सहित अनेक सोशल वर्क किए हैं।केन्या के सर्वोच्च अवॉर्ड Elder of Burning Spear से भी सम्मानित किया जा चुका है। 2007 में उन्हें केन्या के प्रेसिडेंट अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया। वहीं, 2012 में उन्हें यूके के फिलेनथ्रॉपी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

 टिप्पणी:-यह कहानी कोई अधूरापन दिखे तो मेरी गलती समजना... यह सुनी हुई सत्य कहानी में दोहरा रहा हुं...🙏🌹जय प्रभु.. सब पर कृपा करे🌹🙏


 

राम ही सत्य है

           आज विजयादशमी है.

मर्यादा पुरूषोत्तम राम (सत्य)की विजय का पर्व है। राम युद्ध के आकांक्षी नहीं हैं।  बार-बार दूत भेजकर रावण को तरह-तरह से समझाने-मनाने के प्रयास करते हैं। युद्ध में किसी मर्यादा-परंपरा का उल्लंघन नहीं करते। रावण की अंतिम विदाई राजसी ठाठ से करवाते हैं, जीती हुई लंका में किसी भी व्यक्ति का अनादर नहीं करते। रावण के भाई को ही लंका राज्य सौंप देते हैं और उस राज्य से एक भी  चीज साथ नही ले जाते हैं, सभी  लंकावासी का दिल जीत लेते हैं।  राम की इस महाविजय का महत्व सबको समझना चाहिए। समग्र विश्व मे ऐसी महाविजय महोत्सव मनाता है.निस्संदेह, विजयादशमी का महापर्व अपनी समग्रता में पूरे संसार के लिए युद्ध नहीं, बल्कि प्रेम और मर्यादा का संदेश छोड़ जाता है

टिप्पणी: आज दुनिया में कई देश अपने शत्रु देश को पूरी तरह तबाह करके खुद को वर्चस्व स्थापित करने के लिए युद्ध करते हैं.

रावण दहन का तात्पर्य

 "विजयादशमी" की हार्दिक शुभकामनाएँ"

दशहरे के शुभ अवसर पर,मैं आपके जीवन के सभी तनाव  और चिंताओं को मिटाने की और आपके जीवन में सफलता की कामना करता हूं। आपको और आपके परिवार को दशहरा की शुभकामनाएँ।

"दशहरा" = दस + हरा"। कहने का तात्पर्य यह है कि दशानन को  मारनेवाला या हरानेवाला.  हमारे अंदर रावण के दस मस्तक (अवगुण) है उसको जलाने का आज संकल्प करते है. हमारे अंदर सत चित औऱ आनंद के दस शत्रु परनियंत्रण होना जरूरी है
(१) काम  (२) क्रोध (३) मोह  (४) लालच
(५) मद(अंहकार) (६) ईर्ष्या  (७) गुमान (८) अज्ञान
(९) अनिष्ट मन  (१ ०) अशुद्ध चित्त

રૂપાણી સાહેબ ની જીવન ઝરમર

નમસ્કાર, દરેક ભારતીયજન ને મારા જીવનકાળ દરમિયાન બે મહાનુભાવોની જીવન શૈલી સરળ, ભલા-ભોળા(કપટ રહિત) અને સેવા -ભાવી...જોયા 1 સ્વ. શ્રી અમરસિંહ ચૌ...