जिसके उपदेश् सुधारस का कर पान धनंजय जाग उठा ।
जिसके उपकारक जीवन से वह समरांगण को भाग उठा ||
थी प्रिय रुक्मिणी एक पत्नी परब्रह्म विवेक विचारिणी थी|
स्नेहमयी सुख शान्ति दायिनी पतिव्रत धर्म धारणी थी ||
किया वर्ष बारह तक पति पत्नी ने ब्रह्मचर्य का पालन |
सब वैभव भोग विलास छोड़ फिर प्रद्युम्न सा एक जन्मा बाल ||
ऐसे महामानव के चरित्र को लांछित करना ठीक नहीं |
चोर जार गोपी वल्लभ राधापति कहना ठीक नहीं ||
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